साक्षी: समस्त धर्म-अनुभव
की एकमात्र वैज्ञानिक आधारशिला
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साक्षी का मतलब क्या है? साक्षी का
मतलब है: देखने वाला, गवाह।
मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव
होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? ऐसा कौन इनकार करता चला जाता है कि मैं यह
नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह
नहीं हूं?
एक तत्व है हमारे भीतर दर्शन का, दृष्टि का, द्रष्टा का, देखने का। हम देख रहे हैं; हम जांच रहे हैं।
वह जो देख रहा है, वही है साक्षी;
जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। जो देख रहा है, वही हूं मैं; और जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। अध्यास का अर्थ है कि जो देख
रहा है, वह भूल से यह समझ लेता है कि जो दिखाई पड़ रहा
है वह मैं हूं। यह अध्यास है। एक हीरा मेरे हाथ में रखा है। उसे मैं देख रहा हूं। अगर मैं यह कहने लगूं
कि मैं हीरा हूं तो अभ्यास होगा। क्योंकि हीरा मेरे हाथ पर रखा है, दिखाई पड़ रहा है, आब्जेक्ट है, एक विषय है, और मैं देखना वाला हूं, अलग हूं।
देखना वाला सदा ही अलग है उससे जो दिखाई पड़ता है। देखने वाला कभी भी दृश्य के साथ एक नहीं है। देखने वाला सदा ही दिखाई पड़ने वाले से भिन्न है। मैं आपको देख रहा हूं क्योंकि आपसे भिन्न हूं, आप मुझे देख रहे हैं क्योंकि मैं आपसे भिन्न हूं। जो
भी दिखाई पड़ता है वह आपसे भिन्न है। उसको ही अपने से अभिन्न समझ लेना अध्यास है। जिसको आप देख रहे हैं उसके साथ इतने मोहित हो जाना कि लगने लगे यह मैं ही हूं, यही भ्रांति है। इस भ्रांति को तोड़ना है और अंततः उस शुद्ध तत्व को खोज लेना है जो सदा ही देखने वाला है और कभी दिखाई नहीं पड़ता।
यह थोड़ा कठिन है। जो देखने वाला है वह कभी दिखाई नहीं पड़ सकता। क्योंकि वह किसको दिखाई
पड़ेगा? आप सारी चीजों को देख सकते हैं जगत की, सिर्फ अपने को छोड़ कर। आप अपने को
कैसे देखिएगा? क्योंकि देखने में दो की तो जरूरत पड़ेगी ही - जो देखे और जो दिखाई पड़े।
आप सब कुछ देख सकते हैं, अपने भर को आप नहीं देख सकते हैं। कैसे देखिएगा? किसी चिमटे से हम उसी चिमटे को पकड़ने की कोशिश करने लगें! सब पकड़ सकते हैं उस चिमटे
से, सिर्फ उसी चिमटे को पकड़ने की
कोशिश असफल जाएगी। और तब बड़ी मुश्किल होगी कि यह चिमटा भी कैसा पागल है! सब कुछ पकड़ लेता है तो अपने को क्यों नहीं पकड़ पाता?
हम सब कुछ देख लेते हैं, अपने को नहीं देख पाते। देख भी नहीं पाएंगे। और जिसको भी हम देख लेंगे, जान लेना कि वह हम नहीं हैं। तो जिस चीज को भी आप देखने में समर्थ हो जाएं, आप समझ लेना कि
इतनी बात तय हो गई कि यह मैं नहीं
हूं। कोई आदमी अगर ईश्वर का दर्शन कर ले, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई कि आप ईश्वर नहीं हैं।
आपको भीतर प्रकाश का
दर्शन हो जाए, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई
कि आप प्रकाश नहीं हैं। आपको भीतर आनंद का अनुभव हो जाए, तो आप एक बात पक्की समझ लेना कि आप आनंद नहीं हैं। जिस चीज का भी अनुभव हो जाए वह आप
नहीं हैं। आप तो वह हैं जिसको अनुभव होता है। तो जो भी चीज अनुभव बन जाती है, उसके आप पार हो जाते हैं। इसलिए एक
कठिन बात समझ लेनी उपयोगी
होगी, कि अध्यात्म कोई अनुभव नहीं
है। दुनिया में सब चीजें अनुभव हैं, अध्यात्म कोई
अनुभव नहीं है। अध्यात्म तो उसकी
तरफ पहुंच जाना है जिसको सब अनुभव होता है और जो स्वयं
कभी अनुभव नहीं बनता - अनुभोक्ता,
साक्षी, द्रष्टा।
आपको मैं देखता हूं; उधर आप हैं, इधर मैं हूं। उधर आप हैं
जो दिखाई पड़ रहा है; इधर मैं हूं जो देख रहा है। ये दो हैं।
अपने को बांटने का कोई उपाय नहीं है कि मैं अपने को
दो टुकड़े में कर लूं, और एक देखे और एक दिखाई पड़े। अगर
टुकड़ा हो सके - दो टुकड़े हो सकें - तो जो टुकड़ा देखेगा,
वही मैं हूं; और जो टुकड़ा दिखाई पड़ेगा, वह मैं
नहीं रहा। वह बात समाप्त हो गई। वह मुझसे
टूट गया। वह अलग हो गया।
उपनिषद की व्यवस्था, प्रक्रिया, विधि
यही है: नेति - नेति। जो भी दिखाई पड़
जाए, कहो कि यह भी नहीं। जो
भी अनुभव में आ जाए, कहो यह भी
नहीं। और हटते जाओ पीछे, हटते
जाओ पीछे, हटते जाओ पीछे। उस समय
तक हटते जाओ, जब तक कि कोई भी
चीज इनकार करने को बाकी रहे।
एक ऐसी घड़ी आती है, सब
दृश्य खो जाते हैं। एक ऐसी घड़ी
आती है, सब अनुभव गिर जाते हैं... सब। ध्यान
रखना, सब। कामवासना का अनुभव तो गिरता ही है,
ध्यान का अनुभव भी गिर जाता है। संसार के, राग-द्वेष
के अनुभव तो गिर ही जाते हैं, आनंद, समाधि, इनके
भी अनुभव गिर जाते हैं। बच रहता है खालिस देखने
वाला। कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, शून्य
हो जाता है चारों तरफ। रह जाता है केवल देखने वाला और चारों
तरफ रह जाता है खाली आकाश। बीच में
खड़ा रह जाता है द्रष्टा, उसे कुछ भी दिखाई
नहीं पड़ता; क्योंकि उसने सब इनकार कर दिया। जो
भी दिखाई पड़ता था, हटा दिया मार्ग से। अब उसे कुछ
भी अनुभव नहीं होता। हटा दिए सब
अनुभव। अब बच रहा अकेला, जिसको अनुभव होता था।
जब कोई भी अनुभव नहीं होता, और
कोई दर्शन नहीं होता, और कोई दिखाई
नहीं पड़ता, और कोई विषय नहीं रह
जाता, और जब साक्षी अकेला रह जाता है, तब
कठिनाई है भाषा में कहने की कि क्या होता है।
क्योंकि हमारे पास अनुभव के सिवाय कोई शब्द नहीं
है। इसलिए इसे हम कहते हैं आत्म-अनुभव, लेकिन अनुभव
शब्द ठीक नहीं है। हम कहते हैं
चेतना का अनुभव या ब्रह्म-अनुभव। लेकिन यह शब्द, कोई
भी शब्द ठीक नहीं है;
क्योंकि अनुभव उसी दुनिया का शब्द है, जिसको हमने
तोड़ डाला। अनुभव उस द्वैत की दुनिया में अर्थ रखता
है जहां दूसरा भी था, यहां अब कोई अर्थ
नहीं रखता। यहां सिर्फ अनुभोक्ता बचा,
साक्षी बचा।
इस साक्षी की तलाश ही
अध्यात्म है।
ध्यान देना, ईश्वर की तलाश अध्यात्म
नहीं है। पुराने योग-सूत्रों ने ईश्वर की
चर्चा ही नहीं की, बात
ही नहीं उठाई; कोई जरूरत न
थी। बाद में योग-सूत्रों ने ईश्वर की चर्चा
भी की तो उसको भी एक
अध्यात्म की खोज का साधन कहा, साध्य
नहीं। उसे भी कहा कि यह साधना में
सहयोगी होता है इसलिए ईश्वर को मान लेना अच्छा
है। साधना में सहयोगी होता है, अध्यात्म
की खोज में, इसलिए मान लेना अच्छा है। एक
उपकरण है, ईश्वर भी एक विधि है... बस।
इसलिए बुद्ध ने इनकार कर दिया, महावीर ने ईश्वर को
इनकार कर दिया। उन्होंने दूसरी विधियां खोज
लीं। उन्होंने कहा, इस विधि की कोई
भी जरूरत नहीं है। अगर विधि
ही है ईश्वर, तो फिर दूसरी विधियों से
भी काम चल सकता है।
लेकिन बुद्ध और महावीर भी
साक्षी को इनकार नहीं कर सकते;
ईश्वर को इनकार कर सकते हैं। सब कुछ इनकार किया जा सकता
है, लेकिन अध्यात्म की जो आत्यंतिक आधारशिला है
वह साक्षी है, उसे इनकार नहीं किया
जा सकता। इसलिए चाहे ईसाइयत, चाहे इस्लाम, चाहे हिंदू, चाहे
जैन, चाहे बौद्ध, एक बात आप खोज लेना: अगर किसी
भी धर्म में साक्षी की कोई
बात हो, तो समझना कि वह धर्म है; अगर साक्षी
की बात ही न हो, तो समझना कि उसका
धर्म से कोई भी संबंध नहीं है। और
सब बातें गौण हैं; और सब बातें उपयोगी, गैर-
उपयोगी हैं; और सब बातों में मतभेद हो सकता है,
साक्षी के मामले में मतभेद नहीं हो
सकता।
इसलिए अगर किसी दिन दुनिया में धर्म का विज्ञान
निर्मित होगा तो उसमें ईश्वर, आत्मा, ब्रह्म, इन
सबकी चर्चा नहीं होगी,
क्योंकि ये सब स्थानीय बातें हैं, कोई धर्म मानता है,
कोई नहीं मानता; लेकिन साक्षी
की चर्चा जरूर होगी, क्योंकि
साक्षी स्थानीय घटना नहीं
है। धर्म ही नहीं हो सकता बिना
साक्षी के। तो साक्षी भर एक वैज्ञानिक
आधारशिला है समस्त धर्म-अनुभव की, समस्त
धर्म की खोज और यात्रा की। और इस
साक्षी पर ही सारे उपनिषद घूमते हैं,
इर्द-गिर्द। सारे सिद्धांत और सारे इशारे इस साक्षी को
दिखाने के लिए हैं।
थोड़ा हम समझने की कोशिश करें। क्योंकि शब्द से तो
समझ में आ जाता है कि साक्षी का क्या मतलब है,
लेकिन साधना में बड़ी जटिल बात है।
हमारा जो मन है वह एक तीर की
तरह है, जिसमें एक तरफ फल लगा हुआ है तीर
का। तीर को आपने देखा है? तीर दो तरफ
नहीं चल सकता। अगर आप तीर को चला
दें, तो एक ही तरफ जाएगा। या कि आप सोचते हैं दो
तरफ भी जा सकता है? तीर के दो तरफ
जाने का कोई भी उपाय नहीं है।
तीर जाएगा अपने निशाने की तरफ, एक
तरफ।
तो जब प्रत्यंचा पर कोई तीर को चढ़ाता है, और
प्रत्यंचा से तीर छूटता है, तो दो बातें खयाल में ले लें।
प्रत्यंचा, जहां वह चढ़ा था, वहां से छूट जाता है, दूर हटने
लगता है; और जहां वह नहीं था - साध्य, लक्ष्य
- उस तरफ बढ़ने लगता है। एक स्थिति यह थी कि
प्रत्यंचा पर चढ़ा था तीर, दूर बैठा था
पक्षी वृक्ष पर, उसकी छाती
में नहीं चुभा था तीर, तीर था
प्रत्यंचा पर, पक्षी पर नहीं था; फिर
छूटा तीर, प्रत्यंचा से दूर होने लगा और
पक्षी के पास होने लगा। फिर एक स्थिति आई कि
पक्षी की छाती में चुभ गया;
प्रत्यंचा खाली रह गई और तीर
पक्षी की छाती में हो गया।
ध्यान, पूरे समय हम यही कर रहे हैं कि जब
भी हमारे ध्यान का तीर छूटता है तो
हमारी प्रत्यंचा से खाली हो जाता है,
भीतर से; और जिसकी तरफ जाता है उस
पर जाकर टिक जाता है।
कोई चेहरा आपको सुंदर लगा, तीर छूट गया ध्यान का।
भीतर नहीं है अब तीर;
अब ध्यान भीतर नहीं है; अब ध्यान
भागा और दौड़ा और सुंदर चेहरे से जाकर लग गया। सड़क पर
हीरा पड़ा है, तीर छूट गया प्रत्यंचा से।
अब ध्यान भीतर नहीं है; अब ध्यान
भागा, दौड़ा और जाकर चुभ गया हीरे की
छाती में। अब ध्यान हीरे में है, अब
आप में नहीं है; या ध्यान अब कहीं
और है। तो आपके सब ध्यान के तीर
कहीं, कहीं जाकर छिद गए हैं। आपके
पास भीतर कोई ध्यान नहीं है, हमेशा
बाहर जा रहा है।
तीर तो इकतरफा ही हो सकते हैं,
लेकिन ध्यान दोतरफा हो सकता है। और वही हो
जाए, तो साक्षी का अनुभव होता है। ध्यान का
तीर दोतरफा हो सकता है; उसमें दो फल हो सकते
हैं। और जब आपका ध्यान किसी की
तरफ जाए, तो आप अगर इतना कर पाएं, तो आपको
साक्षी का अनुभव किसी न
किसी दिन हो जाएगा।
जब आपका ध्यान किसी पर जाए, रास्ते से
गुजरी कोई सुंदर युवती, कोई सुंदर युवक -
आपका ध्यान अटक गया। तब आप अपने को बिलकुल भूल गए।
यहां भीतर ध्यान न रहा। अब आप होश में
नहीं हैं। अब आप बेहोश हैं, क्योंकि आपका होश
तो किसी और के पास चला गया। अब आपका होश तो
उसकी छाया बन गया। अब आप होश में
नहीं हैं।
अगर आप यह काम कर सकें कि कोई आपको सुंदर दिखाई पड़ा,
ध्यान उस पर गया, उस समय इस पर भी
भीतर ध्यान जाए जहां से प्रत्यंचा से
तीर छूट रहा है; उसकी तरफ
भी हम एक साथ ही अगर देख पाएं;
जहां से ध्यान जा रहा है वह स्रोत और जिसकी
तरफ ध्यान जा रहा है वह लक्ष्य, अगर दोनों हमारे ध्यान में
एक साथ आ जाएं, तो आपको पहली दफा पता चलेगा
कि साक्षी का क्या अर्थ है। कहां से ध्यान जा रहा
है, उस स्रोत का अनुभव होना चाहिए - कहां से ध्यान पैदा हो
रहा है!
वृक्ष हमें दिखाई पड़ता है; शाखाएं दिखाई पड़ती हैं;
फूल-पत्ते दिखाई पड़ते हैं; फल लग जाते हैं वे दिखाई पड़ते हैं;
जड़ें हमें नहीं दिखाई पड़तीं, जड़ें अंधेरे
में छिपी हैं। लेकिन वहीं से वृक्ष रस ले
रहा है।
आपका ध्यान फैलता है चारों तरफ, जगत का बड़ा वृक्ष निर्मित हो
जाता है। लेकिन जहां से ध्यान निकलता है, जिस स्रोत से, जिस
चैतन्य के सागर से निकलता है, उस तरफ का आपको कोई
भी पता नहीं है। उन जड़ों का
भी बोध साथ-साथ होने लगे, एक साथ आपको दोनों बात
दिखाई पड़ने लगें...।
इसे ऐसा समझें। मैं बोल रहा हूं, तो आपका ध्यान मेरे बोलने पर
लगा है। इसको दोहरा तीर बना लें। यह दोहरा
तीर अभी, इसी वक्त
भी बन सकता है। जब मैं बोल रहा हूं, तो आप
केवल मैं जो बोल रहा हूं वही न सुनें, आपको यह
भी स्मरण रहे कि मैं सुन रहा हूं। बोलने वाला कोई
और है, वह बोल रहा है; मैं सुनने वाला हूं, मैं सुन रहा हूं।
अगर आप एक क्षण को भी - अभी,
यहीं - ये दोनों बातें एक साथ कर लें: सुनें
भी और सुनने वाले का स्मरण भी, रिमेंबरिंग
भी भीतर बनी रहे कि मैं सुन
भी रहा हूं।
शब्द दोहराने की जरूरत नहीं है। अगर
आप कहें कि मैं सुन रहा हूं, तो उतनी देर में आप
सुन न पाएंगे; जो मैंने कहा वह चूक जाएगा। भीतर
शब्द बनाने की जरूरत नहीं है कि मैं
सुन रहा हूं, मैं सुन रहा हूं। अगर आपने ऐसा किया तो
उतनी देर आप बहरे हो जाएंगे। उस सेकेंड आप
अपनी भीतर की आवाज
सुनेंगे कि मैं सुन रहा हूं, लेकिन जो मैं बोल रहा हूं यहां से वह
आपको सुनाई नहीं पड़ेगा।
मैं जो बोल रहा हूं वह सुनाई पड़ता रहे, और साथ
ही आपको यह भी स्मरण हो जाए -
शब्दों में नहीं - यह भी
आपकी प्रतीति साफ हो जाए कि इधर
सुनने वाला भी बैठा है। इधर सुनने वाला है, उधर
बोलने वाला है। ये दोनों एक साथ आपकी चेतना में
झलक जाएं, तत्क्षण आपको साक्षी का अनुभव हो
जाएगा कि साक्षी क्या है। साक्षी वह
है जो इन दोनों को देख रहा है।
और थोड़ा भीतर प्रवेश करें। आप सुन रहे हैं, मैं
बोल रहा हूं, साक्षी वह है जो दोनों का अनुभव कर
रहा है कि बोला जा रहा है, सुना जा रहा है। जब
आपकी चेतना का तीर दोहरा हो जाता है
तो तत्क्षण आप तीसरे बिंदु पर खड़े हो जाते हैं।
मैंने बोला; यह एक बिंदु हुआ। साधारणतः आपका ध्यान
इसी पर लगा रहता है। आपने सुना भी,
आप सुनने वाले हैं, ऐसी भी आपको
प्रतीति हुई, एहसास हुआ, अनुभव हुआ; यह
दूसरा बिंदु हो गया। यह दूसरा बिंदु पाना बहुत कठिन है। अगर
यह दूसरा बिंदु आपको मिल जाए तो तीसरा बिंदु पाना
बहुत सरल है। वह तीसरा बिंदु यह है कि बोलने
वाला है अ, सुनने वाला है ब, फिर आप कौन हैं
भीतर जो कि दोनों को अनुभव कर रहे हैं - बोलने वाले
को भी और सुनने वाले को भी! आप
तीसरे हो गए, दि थर्ड प्वाइंट। वह जो
तीसरा बिंदु है, वही साक्षी
है। इस तीसरे के पार नहीं जाया जा
सकता। यह तीसरा आखिरी बिंदु है। और
यह है त्रिकोण जीवन का। दो बिंदु: विषय और
विषयी। और तीसरा बिंदु: दोनों का
साक्षी; दोनों को अनुभव करने वाला; दोनों को
भी देख लेने वाला; दोनों का भी गवाह।
इस सूत्र को अब हम समझें।
"अपने को बुद्धि और उसकी वृत्ति का
साक्षी जान कर वह मैं ही हूं,
ऐसी वृत्ति द्वारा सब पदार्थों के ऊपर से आत्म-बुद्धि
का त्याग करता है।"
खोजी, इस सत्य का अन्वेषक, मुमुक्षु, ऐसा अनुभव
करके कि मैं सदा साक्षी हूं, कभी कर्ता
नहीं, सदा साक्षी हूं, कभी
भोक्ता नहीं, समस्त चीजों के ऊपर से
अपनी वासना का, अस्मिता का, मेरे-पन का भाव छोड़ देता
है। हटता जाता है भीतर उस बिंदु तक, जिसके आगे
हटने का फिर और कोई उपाय नहीं।
"लोक का अनुसरण करना छोड़ कर...।'
ऐसा व्यक्ति फिर लोक का अनुसरण करना छोड़ देता है। लोक का
अर्थ है: समाज, संस्कृति, सभ्यता; लोग जो आपके चारों तरफ हैं,
भीड़।
जब तक आपको साक्षी का अनुभव न हो, तब तक
लोक का अनुसरण छोड़ना खतरनाक भी है; क्योंकि लोक
के साथ जुड़ी है नीति, जुड़ा है नियम,
जुड़ी है मर्यादा, जुड़ी है व्यवस्था,
अनुशासन। तो जो अभी अपना मालिक नहीं
है, निश्चित ही, समाज उसका मालिक होगा। जो अपना
ही मालिक नहीं है, किसी
को उसे नियंत्रित करना होगा। कोई अनुशासन चाहिए, अन्यथा
विक्षिप्त हो जाएगी अवस्था, अराजक
जाएगी। लेकिन जिसे अपने होने का अनुभव हो गया,
जिसे साक्षी का अनुभव हो गया, इस जगत में अब
वह अपना मालिक स्वयं है।
||JBS||