जय बाबा स्वामीआत्म परीक्षण यानी आत्मग्लानी नहीँ हे क्योंकि आत्म ग्लानी से मनुष्य ऊस घटना में नहीँ रहता हे ओर एेसा मेने क्याे किया ओेेैर मुझसे एेसा क्या हो गया मुझे ऐसा नहीँ करना था यानी उस घटना से उस समय भी जुड़ा हुआ पाता हे और यह भूतकल की घटना उसके मस्तिष्क पर प्रभाव डालती हे और ऐसा नहीँ करना हे ऐसा सोचते सोचते हुए भी वह चित उस घटना पर ही रखता हैे ओर जीवन मेँ उसी घटना को ना चाहते हुए भी दोहराता हे लेकिन आत्मपरीक्षण मेँ ऐसा नहीँ हे जिसमेँ मनुष्य प्रथम उस घटना मेँ से बाहर आ जाता हे ओर एक तटस्थ दर्शक की भूमिका मेँ आता है फिर उस घटना से अलग हो कर देखता हे ,ऐसा मेरे साथ क्या हुआ ,मेरी कहाँ कहने मेँ करने मेँ गलती हुई वह देखता है औरे घटना से अलिप्त होकर देखता हे कोई पश्चाताप नहीँ करते मन मे यह भाव रखता हे जो हो गया वह हो गया अब आगे की और देखाे अौर भविष्य मे ऐसी घटना फिर हो जाने पर अपने अनुभव से सिखता हे ओर वही गलती फिर नहीँ करता है इस प्रकार आत्मपरीक्षण करने के लिए प्रथम एक संतुलन की स्थिति होनी चाहिए क्योंकि संतुलन की स्थिति मेँ ही साक्षीभाव का निर्माण होता हैओर समर्पण ध्यान पद्धति साक्षीभाव की स्थिति सदेव बनाए रखी जा सकती है हिमालय का समपँण योग - भाग ४
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