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गुरु दीक्षा : -एक ईश्वरीय अनुकम्पा....

गुरु दीक्षा : -एक ईश्वरीय अनुकम्पा....

दीक्षा एक ईश्वरीय अनुकम्पा है | यह एक घटना है
- संयोग से घटती है बस घट जाती है | जो
दीक्षा लेने की सोचकर आते है वो बिना लिए
ही लौट जाते है और जिन्होंने विचार तक नहीं
किया वो दीक्षित होकर हमेशा-हमेशा के
लिए गुरु से अभिन्न हो जाते है |
एक दिव्या और परमात्म घटना है इसे न तो कोई
देता है न कोई लेता है बस घट जाती है, परमात्मा
का अवतरण चुपचाप हो जाता है और उसी अवतरण
का गुरुमात्र साक्षी है, दृष्टा है | आपको संसार
का पता है, परमात्मा का नहीं | गुरु को दोनों
का पता होता है वह दृष्टा है, साक्षी है इस
घटना का, क्योंकि गुरु परंपरा से होती हुई वह
चिन्मय शक्ति आपके गुरु में एकत्र होती है | गुरु
दिव्या चेतना का पुंजीभूत रूप ही तो है और आप
में आपकी पात्रता के अनुरूप वह दिव्यशक्ति
उतरती है जिसे शक्तिपात कहतें है और उसी का
साक्षी बन जाते है गुरु |
दीक्षा लेने के पूर्व ही पग पग पर गुरु की परीक्षा
होनी चाहिए | दीक्षा के उपरान्त गुरु को
समग्ररूप से ग्रहण करना होता है क्योंकि आपका
आकर्षण बौद्धिक तल पर घटता है और आप
दीक्षा ले लेते है तो वैसी दीक्षा की कोई
उपयोगिता नहीं है - बिलकुल अधूरी दीक्षा है |
कोई स्वार्थ, कोई शर्त, कोई लिप्सा यदि हो
तो दीक्षा व्यर्थ हो जाती है क्योंकि वैसे
लोग समर्पण नहीं कर पाते | सदशिष्य होने की
उनमे पात्रता नहीं होती परन्तु यदि कोई इतना
खो जाए गुरु के चिंतन में, विग्रह में, उसके भाव में
की उसके साथ हर क्षण भावोत्कर्ष में ले जाए,
उसके प्रेम में इतना डूब जाए आप, उसका सब कुछ
अपना-अपना सा लगे परम शान्ति को उपलब्ध
हो जाए, उसकी हर चेष्टा परम प्रिय लगने लगे
आनंद और शान्ति की परा अनुभूति हो और जब
किसी व्यक्ति के प्रति इतना दिव्य और पवित्र
आकर्षण हो जाये की वह बौद्धिक विलास की
वस्तु न होकर प्रेमास्पद बन जाये, हृद्यांगन में उतर
जाये, मस्तिष्क , बौद्धिक तल के झरोखों से, तो
उसे ही अपना गुरु बना ले वही आपके लिए सदगुरू
हो सकता है अन्यथा दीक्षा भी एक बंधन है और
नहीं टूटने वाला बंधन निर्मित न करे | दीक्षा के
बाद कुछ भी समर्पित करने लायक सेष न रहे जो
कुछ भी था समर्पित हो जाये तभी दीक्षा
पूर्ण होती है तभी अध्यातम के दुर्गम पथ के पथिक
की पात्रता आपमें आ सकती है | और आपका
उद्देश्य या भाव हो तो उसे विसर्जित कर दे...

गुरुकृपा ही केवलम ....

|| वन्दे गुरुपरम्पराम ||