नाद(sound) दो तरह के होते हैं आहद और अनाहद। आहद का अर्थ दो वस्तुओं के संयोग से उत्पन्न ध्वनि और अनाहद का अर्थ जो स्वयं ही ध्वनित है। आहद नाद वो नाद है जिसे हम कान से सुन सकते हैं और अनाहद का मतलब है जो महसूस किया जाता है। नाद योग का उद्येश्य है आहद से अनाहद की ओर ले जाना। ब्रह्मांड और शरीर दोनों में अनाहद ध्वनि गूंज रही हैं अर्थात् ब्रह्मांड में गूंज रहे अनाहद से शरीर में गूंज रहे अनाहद से जोड़ना ताकि अपने बाहरी मन को आंतरिक मन की ओर ले जा सके यही नादयोग का उद्देश्य हैं
कैसे करें-
आप पहले एक नाद उत्पन्न करो, फिर उस नाद के साथ अपने मन को जोड़ो। मन को एकतार में लगाए रखने के लिए ही तो ॐ का अविष्कार हुआ है। ॐ किसी शब्द का नाम नहीं है। ॐ एक ध्वनि है, जो किसी ने बनाई नहीं है। यह वह ध्वनि है जो पूरे कण-कण में, पूरे अंतरिक्ष में हो रही है।इस ॐ की ध्वनि का अनुसंधान करना ही नाद योग या नादानुसंधान कहलाता है। जैसे ॐ (ओम) का उच्चारण आपने किया, तो उस ध्वनि को आप अपने कानों से सुनते भी हैं। ऊँ का उच्चारण करने से इस शब्द की चोट से शरीर के किन-किन हिस्सों में खास प्रभाव पड़ रहा है, उसको ध्यान से जाने, अनुसंधान करें। सर्वप्रथम कानों को अँगूठे या पहली अँगुली से बंद करें और ॐ का भ्रमर गुंजन करें तो उसका सबसे अधिक प्रभाव गालों में, मुँह में, गर्दन में पड़ेगा। फिर आप कानों के पिछले हिस्से में, नाक पर, फिर कपाल में, सिर में आप गुंजन की तरंगों को क्रमश: महसूस करें। नाद को जब आप करते हो तो यह है इसकी पहली अवस्था। दूसरी अवस्था है जहाँ नाद करोगे नहीं, सिर्फ़ अपने कानों को बंद किया और भीतर सूक्ष्म ध्वनि को सुनने की चेष्टा करना। यह सूक्ष्म ध्वनि आपके भीतर हो रही है। यह ध्वनि प्रारंभ में झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी। योग कहता हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दैवीय शब्द ध्वनित होते रहते हैं, लेकिन व्यक्ति को इतनी भी फुरसत नहीं है कि स्वयं को सुन ले।
ॐ के उच्चारण का अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है जबकि उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती आप सिर्फ आँखें और कानों को बंद करके भीतर उसे सुनें और वह ध्वनि सुनाई देने लगेगी। भीतर प्रारंभ में वह बहुत ही सूक्ष्म सुनाई देगी फिर बढ़ती जाएगी।
इस नाद की तरंगों की खोज करना और यह नाद कहाँ से निकल रहा है, उसका भी पीछा करना और इस नाद की तरंगें कहाँ-कहाँ जा रही हैं, उसको बहुत ध्यान से सुनना ही नाद-अनुसंधान है और इसको ही नाद योग कहते हैं। फिर आप देखें कि कानों के पिछले हिस्से में, और अधिक ध्यान से देखेंगे तो नाक पर, अगर आपके देखने का दायरा और बढ़ता चला जाएगा तो आप देखेंगे कपाल में, सिर में आप इन तरंगों को महसूस करेंगे।
108 प्रधान उपनिषदों में से नाद-बिंदु एक उपनिषद है, जिसमें बहुत से श्लोक इस नाद पर आधारित हैं। नाद क्या है, नाद कैसे चलता है, नाद के सुनने का क्या लाभ है, इन सब की चर्चा इसमें की गयी है।
लाभ-
मानसिक शांति, एकाग्रता में वृद्धि, मानसिक अवसाद से मुक्ति, रोगों से मुक्ति आदि।