अंतर्यात्रा द्वारा मानव से महा-मानव
बाहर के मंदिर-मस्जिदों में जो भटका है, वह भीतर के असली मंदिर और मस्जिद से वंचित रह जाएगा।
बाहर ढूंढने वाला कभी परमात्मा को नहीं पा सकेगा।
धन खोजने वाले भी बाहर खोजते हैं,
और, ध्यान को खोजने वाले भी बाहर खोजते हैं।
धन के खोजने वालों को क्षमा किया जा सकता है,
पर, ध्यान के खोजी को क्षमा नहीं किया जा सकता।
धन बाहर है, ध्यान बाहर नहीं है।
पद-प्रतिष्ठा तो बाहर ही खोजनी पड़ेगी।
लेकिन, परमात्मा को तो भीतर खोजना पड़ेगा।
क्या, भीतर कोई हिंदू है? मुसलमान है?
सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध या पारसी है?
भीतर तो हम निर्मल हैं, निराकार हैं।
भीतर तो हम विशेषणरहित हैं।
भीतर तो न हम ब्राह्मण हैं, न शूद्र; न स्त्री, न पुरुष; न गोरे, न काले!
अरे, भीतर तो हम बच्चे, जवान या बूढ़े भी नहीं!
भीतर तो हम शाश्वत हैं, समयातीत हैं, कालातीत हैं।
भीतर का ही स्वाद मिले तो परमात्मा का स्वाद मिले।
हमें शांत होना है, मौन हो जाना है।
एकांत ढूंढना है, निज में खो जाना है।
हमने अपनों के लिए काफी कुछ किया है,
अब, अपने लिए कुछ करना है।
हमें मानव बनना है, और, फिर, महा-मानव भी!
अपने बंद अंधेरे मन के दरवाजे खोलने होंगे।
परमात्मा हमसे मिलना चाह रहे हैं।