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ध्यान ऊर्जा है । हमारा ध्यान जहां भी होता है उनसे सम्बनिधत सृजन प्रारम्भ हो जाता है

ध्यान  ऊर्जा  है ।  हमारा ध्यान जहां भी होता  है उनसे सम्बनिधत सृजन प्रारम्भ हो  जाता है  | यदि हमारा ध्यान नकारात्मक पहलू  पर है तो नकारात्मक ऊर्जा का  सृजन होता है | यदि ध्यान सकारात्मक पहलू  पर  है  तो सकारात्मक ऊर्जा का सृजन  होता है । हमारी  ऊर्जा हमारे ध्यान की दिशा में बहती है |कठिन  पारिस्थितियों में भी कोई  पाजिटिव  ऊर्जा से भरा हुआ  सृजनात्मक जीवन की ओर अग्रसर होता  रहता  है | अपेक्षित पारिसथतियो  मे भी कोई निम्नतम  ऊर्जा के साथ  निरन्तर अधोगति की  ओर बढता जाता है |  ऐसा लगता है कि पाजिटिव  ऊर्जा  से भरे व्यक्ति का धयान परिस्थितियों  की काठिनाइयों  की ओर नहीं  बाल्कि  कुछ  सृजन  करने की ओर ही है  । बात् पारिस्थितियों की नही है  हमारा ध्यान सकारात्मकता की ओर है तो कठिनाइयों की उपस्थिति  हमें हमें दिखाई भी नहों पडती | यदि हमारा ध्यान नकारात्मक  की  ओर है तो  कठिनाइयों ही  दिखाई  पडती हैं ।काठिनाइयां या  सरलता आस्तित्व  नहीं रखते  सारा खेल  हमारे ध्यान  का है | यदि जीवन में कुछ दुखद  हो रहा है तो पारिस्थितियों के विश्लेषण की  जगह  अपने ध्यान की ओर देखनें  की आवश्यकता है | यह कहाँ अटक गया है वहाँ से हटाने की आवश्यकता है |  दाम्पत्य  जीवन में भी जब नीरसता  आने  लगे तो साथी को दोषी मानने  के बजाय अपने ध्यान को देखने की आवश्यकता है कि हमारा घ्यान  किस  दिशा मे अटक गया है  क्योकि खेल तो सारा ध्यान का ही है |जब हम क्रोध में होते है जब हम भय में होते हैं जब हम उदासी या ईर्ष्या में होते हैं तो हम पारिस्थितियों को जिम्मेवार  ठहराते  हैं  क्या हम  अपने ध्यान की ओर भी देख पाते है कि यह किस दृष्टिकोण के साथ  संलगन   हो गया है |  क्रोध उदासी भय ईर्ष्या  ये तो किसी विशेष  दृष्टिकोण्  के साथ ध्यान  के संलग्न  होने का पारिणाम है यदि ध्यान अन्य दृष्टिकोण के साथ  संलग्न हो जाय तो ये पारिणाम भी हट जायेंगे | क्योंकि  जीवन मे जो जो भी सृजित होंता है चाहे उदासी हो चाहे उत्साह हो चाहे क्रोध हो जो भी हो वह तो दृष्टिकोणो के साथ ध्यान के संलग्न  होने का प्रतिफल  है | ..��������